तुम्हे याद तो होगी
उन गर्मियों की पहली बारिश
जिसमे हम दोनों अपने - अपने अहं में डूबे थे
तुम्हे बात - बात पर रूठने की
और मुझको तुम्हे मनाने की आदत सी हो गयी थी
बारिश में भीगने को कह रहा था मैं
तुम ‘पहली बारिश है’ कहकर अपने कमरे में चली गयी थी
तुम्हे तो पता है न मेरा बारिश से लगाव ||
कल शाम फिर वैसा ही मौसम था कुछ – कुछ
तुम नही थी न आस - पास
बीती यादो में एक बार फिर डुबकी लगाकर सारी तन्हाई मिटा ली मैंने
वक़्त लगता है...
किसी अकल्पित घटना से बाहर आने में
पर मेरा क्या ?
मेरे पास तो तुम्हारे सिवाय किसी के लिए वक़्त है ही नहीं
नहीं ||
||नज़्म ||
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